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Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानीयां


Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानियां

हेलो दोस्तों ततों आप सब लोगों को Hindi kahaniya|हिंदी कहानीयां में स्वागत करता हूं.मैं आज आप लोगों के लिए बहुत ही सुंदर परियों की कहानियां|pariyon ki kahaniya लेकर आया हूं.

मैं आज जो कहानी सुनाऊंगा वह है
1. लाल परी 2.गुलाबी परी.

Hindi kahaniya|हिंदी कहनिया|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानी
Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां


Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानीयां|लाल परी:

उँगलियाँ अब थक चुकी थीं टाईप करते करते। मैं सीधा लेट गई। अस्पताल में हूँ न। जल्दी थक जाती हूँ। कूल्हे में ऑपरेशन हुआ है। कभी पहले वहाँ एक इंजेक्शन पडा था। वो हिस्सा पहले नर्म हुआ फिर सख्त। फिर दर्द का दायरा बढने लगा। शुरु में आदतन ध्यान नहीं दिया। हम भारतीय स्त्रियाँ हमेशा अपने स्वास्थ्य को नज़रांदाज़ करने वाली। शुतुरमुर्ग। न ध्यान दो तो शायद तकलीफ अपने आप गायब हो जाये। कोई जादू का हमेशा इंतज़ार। पर, न जी। ऐसा कोई जादू नहीं हुआ। उससे क्या? हम ढीठ स्त्रियाँ कभी सीखती हैं भला। कुत्ते की दुम कभी सीधी भी हुई है क्या। वर्षों के संस्कार, दबने कुचलाने के, ऐसा लहू में पेवस्त हो गया है कि अब उसके बिना जी नहीं मानता। क्या कहते हैं उसे जो खुद को पीडा दे। हाँ मेसोचिस्ट।

हाथियों में सुना है कि कोई स्मृति विरसे में आती जाती है अगले पीढियों में, कई कई पीढियों में। कहते हैं न, हाथी जैसी याददाश्त। तो हम स्त्रियाँ भी कोई कम नहीं। हम भी ढोती हैं पीडाओं की स्मृति, चिपका रखती हैं छाती से नन्हे छौने सा, बन्दर का चिपका बच्चा। हाँ तो हम भी उसी कौम से हैं सो करते रहे नज़र अंदाज़। जब तकलीफ हद से बाहर हुई तो पति नाम के जीव को बताया। कुछ दिन और बीत गये। दर्द बढ़कर फुनगी पर टिक गया। कभी जाये ही न। आखिर भरती हो गये अस्पताल में।
हाथियों में कोई स्मृति विरसे में आती जाती है अगले पीढियों में। हम स्त्रियाँ भी कोई कम नहीं। हम भी ढोती हैं पीडाओं की स्मृति, चिपका रखती हैं छाती से नन्हे छौने सा।

अब यहाँ अकेले हैं। साथ में एक अटेंडेंट, माने दूर की ननद सुमित्रा। चुप्पी सुमित्रा। बिलकुल बोलती नहीं। मेरे ज़रूरत भर का कर के मगन हो जाती है किसी गुलशन नन्दा टाईप किताब में। टोक टोक कर आजिज कर दिया पर वही ढाक के तीन पात। आखिर थकहार कर छोड दिया। अभी तो हफ्ता दस दिन और रहना है। पति दौरे पर हैं। फोन करते रहते हैं। घर पर बूढ़ी झुरझुर सास हैं। पड़ी रहती हैं अपने कमरे में। फूलमणि करती है देखभाल। आदिवासी फूलमणि। गोदने वाली फूलमणि। खिल खिल हँसती है फूलमणि। घर टिका है उसपर। कहाँ कहाँ दिमाग भटकता है मेरा। पर चुप पड़े पड़े भी क्या करूँ। सुमित्रा पढ रही है, सोफे पर अडस कर। कूल्हे में दर्द हो रहा है, बेतरह। घँटी बजाती हूँ।
नर्स आती है मुस्कुराती हुई,  क्या हुआ आँटी? दर्द हो रहा है क्या? 

मुझे ये वाली नर्स अच्छी लगती है। जेसी, केरल की है। मुस्कुराती है बात करती है। यहाँ नर्स का युनिफॉर्म सफेद नहीं है। गुलाबी सफेद धारियों वाला ट्यूनिक और पैंट।
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Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानीयां|लाल परी:


एक पेनकिलर दे दो जेसी 



 थोडा रुक जाना आँटी। अभी डॉक्टर आयेगा राउंड पर 



चादर ठीक कर देती है। दवाइयों की शीशी तरतीब से सजा देती है। साथ साथ लगातार बात कर रही है। मैं उतनी देर सूरजमुखी के फूल सी खिल जाती हूँ।



घर पर बेटा है। बारहवीं का इम्तहान देगा।

बेटा, मतलब कान फोड संगीत, रेड हॉट चिली पेपर और बैक स्ट्रीट ब्वाय्ज़, धोनी और युवराज के बडे बडे पोस्टर्स, कान में इयरफोन जैसे कान का ही हिस्सा हो,
बेटा मतलब बेतरतीब कमरा, उलटपुलट कपडे, बिखरी किताबें ढेर की ढेर,
बेटा मतलब हाय मॉम बॉय मॉम,
बेटा मतलब बर्गर, पित्ज़ा,फूटलॉंग,
बेटा मतलब पढाई पढाई और फिर पढाई।

एक बेटी भी है।

बैगलोर में मेडिकल की पढाई,
हाथ पैर की वैक्सिंग,
फेशियल और लोरियाल,
क्लच में फँसे स्ट्रीक्ड बाल,
कमर पर टैटू,
नाभी में नथनी,
पैरों में रंगीन धागे,
उजला कोट और स्टेथोस्कोप,
सपने सपने और फिर सपने।

और पति नाम के जीव को कैसे भूला जा सकता है। पति माने फिट फाट पर थोड़े उडते बाल। दौरे और मीटिंग़्स, लगातार फोन – खाना खाते वक्त, सुबह टहलते वक्त, ओफ़िस जाते वक्त, सुबह के वक्त, शाम के वक्त, रात के वक्त, मुझसे बात करते वक्त, मुझसे प्यार करते वक्त।
मेरी आँखें चैट खुमार में मुन्दती हैं। कूल्हे का दर्द बुझ जाता है। चेहरे पर दिव्य मुस्कान बिखर जाती है।

और इन सब के बीच टँगी मैं। बीस साला नहीं पचास साला। किटी पार्टी और ब्रिज, रंगे बाल और ढलकती जवानी। कोई दोस्त नहीं कोई यार नहीं पर कहने को ऐश ही ऐश क्योंकि आखिर मालकिन हूँ एक आलीशान मकान की, घूमती हूँ फोर्ड फियेस्टा में, बीबी हूँ एक वीपी की, माँ हूँ दो होनहार बच्चों की। वक्त ही वक्त है मेरे पास पर अरमेना कोई नहीं।

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इसलिये, हाँ हाजरीन, इसलिये लिखती हूँ कहानियाँ। पहले लिखती थी रोने धोने की कहानियाँ। अब लिख रही हूँ एक नये ज़माने की मॉडर्न कहानी। इसलिये सीखा है कम्प्यूटर। पति अच्छे हैं। ला दिया है लैपटॉप। तो, भाइयों अरु तो कोई नहीं पर लाल परी मैं ही हूँ। सचमुच चैट करती हूँ ताकि कहानी का मसाला तीखा तेज़ हो। चैट का नशा छा रहा है आजकल। डरती हूँ कहीं पूरी तरह से न डूब जाऊँ इसमें। और ये जो खिर्के, नैना, जतीन वगैरह हैं, न न कोई असल नहीं है। सब पतिदेव के ऑफिस से चुने हुये कैरिकेचर्स हैं। समझ रहे हैं न आप। कैरिकेचर मतलब किसी एक शारिरिक या फिर मानसिक गुण को खींचो रबर की तरह कि शेप बिगड जाये पर इतना भी नहीं कि असल खो जाये कहीं।

तो लालपरी तो मैं हूँ पर कूल ड्यूड कौन है? खिर्के, या जतिन या फिर बग्गा द यूनिवर्सल बाबा, या क्या पता नैना नैनकटारी ही हो या फिर वो जो हैंडसम डॉक्टर आता है रोज़ ग्यारह बजे राउंड पर बिना नागा, हैंडसम तो है पर शायद साईनस से पीडित है, हर वक्त सिनकता सुड़कता रहता है। वो भी तो कूल ड्यूड हो सकता है। मैं लैप टॉप बूट करती हूँ। लॉग इन करती हूँ। मेरी उँगलियाँ की बोर्ड पर फिसल रही हैं। कूल्हे का दर्द जलता बुझता है।

 हाय लाल परी, मेरी जान कहाँ हो तुम 

मेरी आँखें चैट खुमार में मुन्दती हैं। कूल्हे का दर्द बुझ जाता है। दवाइयों की महक, बैंडेज़ और पस, आईवी की सूई, कैथेटर की जलन, सब विलीन हो जाता है। मेरे चेहरे पर दिव्य मुस्कान बिखर जाती है।

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Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानीयां|गुलाबी परी:

माँ! आज रात मुझे कहानी सुनाओगी न!”
शी को रात को सोने से पहले कहानी सुनने का बहुत शौक है। वह कक्षा चार में पढ़ती है।


“हाँ बेटा! अभी कुछ देर रुको। मैं रसोई का काम ख़त्म करके जल्दी ही आती हूँ।”

ख़ुशी ने जल्दी से नाईट सूट पहना और अपने पलंग पर आकर लेट गई।

थोड़ी देर में माँ का काम ख़त्म हुआ तो वो भी उसके पास आ कर लेट गईं और बोलीं, “हाँ! अब बताओ कौन सी कहानी सुनाऊँ आज?”


“माँ, आज वो परियों वाली कहानी सुनाओ न,” ख़ुशी को परियों की कहानी सुनना बहुत पसंद है। वह हर तीसरे दिन कोई न कोई परियों वाली ही कहानी सुनना चाहती है।

“अच्छा चलो, आज मैं तुम्हें गुलाबी परी की कहानी सुनाती हूँ,” माँ ने कहानी शुरू की –

“बहुत समय पहले की बात है, परीलोक में बहुत सारी परियाँ रहती थीं। उनमें से गुलाबी परी सबसे प्यारी थी। वह रानी परी की सबसे चहेती परी भी थी। गुलाबी परी यदि कोई इच्छा करती तो वह उसे ज़रूर पूरा करती।

Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानीयां|गुलाबी परी:


एक दिन खेलते–खेलते गुलाबी परी के मन में आया कि क्यों न पृथ्वीलोक पर सैर के लिए जाया जाए। उसने पृथ्वीलोक और वहां के लोगों के बारे में बहुत सुना हुआ था। वे लोग कैसे रहते हैं, वह जानना चाहती थी। उसने अपनी यह इच्छा रानी परी के सामने रखी। पहले तो रानी परी ने ना-नुकुर किया फिर मान गई। आखिर वह गुलाबी परी की इच्छा को कैसे टाल सकती थी।

रानी परी ने कहा, “पर मेरी एक शर्त है। पृथ्वीलोक पर तुम सिर्फ रात में ही जा सकती हो। और सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही तुम्हें वापस आना होगा। सूरज की किरणें तुम्हारे ऊपर नहीं पड़नी चाहिए। नहीं तो तुम्हारे पंख पिघल जाएंगे और तुम वापस नहीं आ पाओगी। तुम्हें हमेशा के लिए मनुष्यों के साथ रहना पड़ेगा।”

ठीक है!” गुलाबी परी ने जल्दी से कहा। वह तो पृथ्वीलोक पर जाने के नाम से ही उत्साहित थी।

“लेकिन तुम अकेले नहीं जाओगी। तुम्हारे साथ तुम्हारी तीन और परी बहनें भी तुम्हारी सुरक्षा के लिए जाएंगी। सब्ज़ परी, नील परी और लाल परी,” रानी परी ने कहा।

गुलाबी परी और भी खुश हो गई। “ये सब तो मेरी सहेलियाँ हैं! अब तो और भी मज़ा आएगा। हम सब वहाँ जा कर मज़े करेंगे, किसी बाग़ में खेलेंगे और नृत्य करेंगे।” बाक़ी परियाँ भी बहुत खुश हो गईं, आखिर उनको भी पृथ्वीलोक पर जाने का मौका मिल रहा था। वे सब रात का बेसब्री से इंतज़ार करने लगीं।

जैसे ही पृथ्वीलोक पर अँधेरा छाया, चारों परियाँ तैयार हो गईं। रानी परी ने एक बार फिर से अपनी चेतावनी दोहराई, “याद रहे, सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही परीलोक वापस आना होगा।” फिर रानी माँ ने सभी परियों को आँखें बंद करने को कहा।

थोड़ी देर बाद जब चारों परियों ने आँखें खोलीं तो वे सब एक हरे भरे बाग़ में थीं। चारों तरफ सुन्दर-सुन्दर फूल खिले हुए थे। तितलियाँ फूलों पर मंडरा रहीं थीं। हवा में ठंडक थी। उन परियों को ये हरियाली इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने नाचना शुरू कर दिया। धीमा-धीमा संगीत न जाने कहाँ से आ रहा था।”

खुशी की जब आँख खुली तो उसे कुछ संगीत की आवाज़ कहीं दूर से आती हुई प्रतीत हुई। जब संगीत की आवाज़ आना बंद नहीं हुई तो वो धीरे से अपने बिस्तर से उतरी और जाकर अपने कमरे की खिड़की खोली, “अरे! ये क्या! ये तो परियाँ हमारे ही बाग़ में हैं।” खुशी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने अपनी आँखें मलीं “नहीं! ये सच है! ये तो सचमुच परियाँ ही हैं। ओह! ये गुलाबी परी कितनी सुन्दर है।” इसके गुलाबी पंख कितने सुन्दर हैं।” गुलाबी परी ने एक बहुत सुन्दर गुलाबी रंग का गाउन पहना हुआ था। उसके सर पर एक छोटा सा मुकुट था जिसमें गुलाबी पत्थर जड़े हुए थे। उसके पंखों में से भी गुलाबी आभा आ रही थी।

चारों तरफ एक मद्धिम, नीले रंग का प्रकाश फैला हुआ था। छोटी-छोटी चमकती हुई किरणें, चारों तरफ फ़ैल गईं। भीनी-भीनी खुश्बू जैसे परियों में से ही आ रही थी। एक स्वप्निल सा वातावरण था। मधुर सा संगीत न जाने किस जादू से सुनाई दे रहा था। गुलाबी परी बीच में मगन हो नृत्य कर रही थी। बाकी तीनों परियाँ भी उसके चारों ओर नाच रहीं थीं।

उन्हें ये भी भान नहीं था कि दो नन्हीं आँखें उन्हें सम्मोहित हो कर देख रहीं हैं।
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Hindi kahaniya|हिंदी कहनियां|pariyon ki kahaniya|परियों की कहानीयां|गुलाबी परी:



ये ख़ुशी ही थी जिसके घर के आँगन में परियाँ उतरीं थीं। खुशी के कमरे से बाग़ का सारा दृश्य दिखाई देता था। जो वह माँ से कहानियों में सुनती आई थी। आज वह सब कुछ अपनी आँखों से देख रही थी।



परियों को साक्षात अपने बाग़ में नाचते हुए देख वह मंत्रमुग्ध हो गई।



“अरे यहाँ तो सब्ज़ परी, लाल परी और नील परी भी हैं,” ख़ुशी की नज़र उन पर गई। उनके वस्त्र, पंख और मुकुट भी हरे, लाल और नीले थे, उतने ही सुन्दर जैसे कि गुलाबी परी के थे।



ख़ुशी परियों के नृत्य में जैसे खो सी गई। कितना समय बीत गया पता ही नहीं चला।


“खुशी! बेटा, उठो! स्कूल जाने का समय हो गया,” उसके कानों में माँ की आवाज़ पड़ी तो वह चौंक कर बिस्तर पर बैठ गई।

“अरे! मैं क्या सपना देख रही थी?” खुशी ने सोचा। ये तो सपना ही था। मैं तो सो कर उठी हूँ। मम्मी की कहानी कब ख़तम हुई और मैं कब सो गई पता ही नहीं चला। और कहानी की परियों को सपने में देखने लगी।

बिस्तर से उतर कर वह खिड़की पर खड़ी होकर बाग़ की तरफ देखने लगी। तभी उसकी नज़र गुलाब के पौधे के पास गई जहाँ कोई चीज़ चमकती हुई दिखाई दे रही थी। खुशी दौड़ कर बाग़ में गई।

“ये क्या है?” घास में एक चमकीला सा सितारा पड़ा हुआ था।


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